ambarishji's blog

आज के परिवेश में एक प्रश्न सभी से ...........

इधर उधर
फुदकती
मन भाती
चारों ओर चहचहाती
चिरैया
आँगन में नृत्य करती
गौरैया
लगता है
शायद अब
किताबों में ही दिखेगी
अमानवीय क्रूर हाथों से
कैसे बचेगी ?

--अम्बरीष श्रीवास्तव
९१, आगा कालोनी , सिविल लाइंस
सीतापुर २६१००१
9415047020
ambarishji@gmail.com
www.ambarishsrivastava.com

"अक्सर देखा है"

काम करते हुए मजदूरों को
श्रम के शूरवीरों को
जिनकी लिखी हुई तकदीरों में
चौराहे पर होती
श्रम की नीलामी को
अक्सर देखा है

नींव खोदते हुए हाथ
गिट्टी तोड़ते हुए हाथ
दहकती दुपहरी में
पसीने से लथपथ
गमछे से बार बार
मुँह पोंछते हुए
प्यास से सूखता हुआ गला
कोल्ड ड्रिंक पीता हुआ ठेकेदार  read more »

-एक मजदूर का दंश -

-एक मजदूर का दंश -

हम चुपचाप सभी कुछ सहते
मेहनत से हम कभी ना डरते
अपना श्रम अनमोल है भाई
काहे को बेगार कराई
भद्दी गाली क्यों हो देते
कामचोर हमको क्यों कहते
अपने घर में आधी रोटी
तेरे हिस्से सारी बोटी
मिला गरीबी फाकामस्ती
मौत हमारी सबसे सस्ती
जब तक अपना शोषण होगा
तब तक तेरा पोषण होगा  read more »

"गौमाता"

युगों-युगों से गौमाता
हमें आश्रय देते हुए
हमारा लालन-पालन
करती आ रही है

हमारी जन्मदात्री माँ तो
हमें कुछ ही बरस तक
दूध पिला सकी
परन्तु यह पयस्विनी तो
जन्म से अब तक
हमें पय-पान कराती रही

हमारी इस नश्वर काया
की पुष्टता के पीछे है
उसके चारों थन
जिस बलवान शरीर
पर हमें होता अभिमान
वह विकसित होता  read more »

"प्रभु परशुराम की महिमा"

भारत वर्ष की धरती पर, प्रभु ने षष्ठम् अवतार लिया |
भक्तों की रक्षा करने को, भगवान ने फरसा थाम लिया ||

त्रेता युग में थे तुम जन्मे, भृगु के पौत्र कहाये थे |
जमदग्नि-रेणुका के तुम जाये, ऋषि-कुल में तुम आये थे ||

प्रसेनजित के पुण्य थे पाए, साक्षात् शिव से फरसा पाया,
कामधेनु का दुग्ध पिया था, माँ के आँचल की थी छाया |  read more »

माँ की महिमा

नैनन में है जल भरा, आँचल में आशीष |
तुम सा दूजा नहि यहाँ , तुम्हें नवायें शीश ||

कंटक सा संसार है, कहीं न टिकता पांव |
अपनापन मिलता नहीं , माँ के सिवा न ठांव ||

रहीं लहू से सींचती, काया तेरी देन |
संस्कार सारे दिए, अदभुद तेरा प्रेम ||

रातों को भी जागकर, हमें लिया है पाल |
ऋण तेरा कैसे चुके, सोंचे तेरे लाल ||  read more »

श्रीराम वंदना "लघु रामायण"

राम नवमी के पावन पर्व पर अनुपम भेंट |
"लघु रामायण"

मनवा मेरा कब से प्यासा, दर्शन दे दो राम,
तेरे चरणों में हैं बसते जग के सारे धाम..............
जय-जय राम सीताराम, जय-जय राम सीताराम.........२

अयोध्या नगरी में तुम जन्मे , दशरथ पुत्र कहाये,
विश्वामित्र थे गुरु तुम्हारे, कौशल्या के जाये,  read more »

सरगमीं प्यास को अपनी मैं बुझा लूँ तो चलूँ

सरगमीं प्यास को अपनी मैं बुझा लूँ तो चलूँ ,
तुम को दिल में आहिस्ता से सजा लूँ तो चलूँ ......२

भीनी यादों को यूँ संजोया है ,
बीज जन्नत का मैंने बोया है,
मन मेरा बस रहा इन गीतों में ,
ख़ुद को आईना, मैं दिखा लूँ तो चलूँ ||

सरगमीं प्यास को अपनी मैं बुझा लूँ तो चलूँ ........2

दिल की आवाज़ यूँ सहेजी है ,  read more »

"होली के रंग "

तेरे दीदार को तरसे हैं हम .......
सूरत तो दिखाने आ जा.......|
कैसे मिलते तुझसे........
रंगों के बहाने आ जा .......

रंग प्यार के हम सब घोलें........
अपनेपन के हों गुब्बारें ......|
इन रंगों की तेज धार से........
बह जांय नफरत की दीवारें .....||

ऐसे रंगना हमें........
दुश्मन पे प्यार आ जाए.......|
भूलकर शिकवे सारे. ......  read more »

"माँ सरस्वती वंदना "

हे, ज्ञान की ज्योति, जगाने वाली.......
हे, अमृत रस, वर्षाने वाली.........
तेरी, महिमा अपरम्पार,
तुझको, पूज रहा संसार .........२

हे, ज्ञान की ज्योति, जगाने वाली.......

जो जन तेरी, शरण में आते,
बल बुद्धि विद्या, ज्ञान हैं पाते ..........२
हे मोक्षदायिनी, देवी माता ......२
कर दो बेड़ा पार ...........
तुझको पूज रहा संसार .........२  read more »

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