लकडबग्घा, आरीफ और वहां घोडे नहीं थे
ढेर से
आर्ध्दत नहीं रहे ।
आराजी नहीं हैं ।
पर आरीफ था ।
आर्नर्तक ।
बिना अवतंश
बिना गोश के ।
कि लकडबग्घा ले भागा था,
आलय में निद्रामग्न ।
आलिंद था
अब्बा थे
अम्मी थी
आपा एक और दो
बेवा खाला ।
आद्र हवा में
आलजाल
इकसर
तैरती
श्रृंखलाए
खुलगिल ।
पर आरीफ था
कुअंक ।
पर लकडबग्घा था या नहीं
नामालूम ।
पर आरीफ था
दोनों हाथ फैलाने तक
यहां-वहां सब तरफ
धान थी,
वैभव था,
बडे-बडे आलय
आपचारी
आरीफ था
सोचा करता
इन फैले
आराजी में
सब कुछ
दुगुना होता है ।
फिर काट कर
घोडे की अवली को
दुगुना होने
क्यों न बो दूं ।
पर आंखों में,
घोडे थे दुगुने,
पर लकडबग्घा था
या नहीं, नामालूम ।
कैसर था वह ।
अहलकार्
आगे-पीछे,
स्मृति थी,
मैं था,
पर लकडबग्घा था
या नहीं,
नामालूम
एक कान ले गया था
अहमक
कुदलाता
अहिनक
इंजन
धुआं
अहोरात्र
काम होता
पर आरीफ था
परछाइयां,
सांझ तक
धूप छोडती
गुम होती,
कूंजगली
लम्बी
अनसुलझी
असंग
आरीफ था
अपना ।
पर लकडबग्घा था
या नहीं
नामालूम ।
अहोरात्र
फिर एक दिन
आपचारी, आरीफ था
बोया था काटकर घोडे
पूरे तेरह सब के सब
फिर खेतों के बीच
खडा,
देखा करता, दुगुने घोडे
अब उसकी आंखों में,
लकडबग्घा नहीं था
मैं नहीं था ।
और वहां घोडे नहीं थे ।
Hindi Kavita Hindi Poetry By Sanjeev Tahkur
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