इकसर - प्रयोगधर्मी कविता

लकडबग्घा, आरीफ और वहां घोडे नहीं थे
ढेर से
आर्ध्दत नहीं रहे ।
आराजी नहीं हैं ।
पर आरीफ था ।
आर्नर्तक ।
बिना अवतंश
बिना गोश के ।
कि लकडबग्घा ले भागा था,
आलय में निद्रामग्न ।
आलिंद था
अब्बा थे
अम्मी थी
आपा एक और दो
बेवा खाला ।
आद्र हवा में
आलजाल
इकसर
तैरती
श्रृंखलाए
खुलगिल ।
पर आरीफ था
कुअंक ।
पर लकडबग्घा था या नहीं
नामालूम ।
पर आरीफ था
दोनों हाथ फैलाने तक
यहां-वहां सब तरफ
धान थी,
वैभव था,
बडे-बडे आलय
आपचारी
आरीफ था
सोचा करता
इन फैले
आराजी में
सब कुछ
दुगुना होता है ।
फिर काट कर
घोडे की अवली को
दुगुना होने
क्यों न बो दूं ।
पर आंखों में,
घोडे थे दुगुने,
पर लकडबग्घा था
या नहीं, नामालूम ।

कैसर था वह ।
अहलकार्
आगे-पीछे,
स्मृति थी,
मैं था,
पर लकडबग्घा था
या नहीं,
नामालूम
एक कान ले गया था
अहमक
कुदलाता
अहिनक
इंजन
धुआं
अहोरात्र
काम होता
पर आरीफ था
परछाइयां,
सांझ तक
धूप छोडती
गुम होती,
कूंजगली
लम्बी
अनसुलझी
असंग
आरीफ था
अपना ।
पर लकडबग्घा था
या नहीं
नामालूम ।
अहोरात्र

फिर एक दिन
आपचारी, आरीफ था
बोया था काटकर घोडे
पूरे तेरह सब के सब
फिर खेतों के बीच
खडा,
देखा करता, दुगुने घोडे
अब उसकी आंखों में,
लकडबग्घा नहीं था
मैं नहीं था ।
और वहां घोडे नहीं थे ।

Hindi Kavita Hindi Poetry By Sanjeev Tahkur

आर्ध्दत (आदर प्राप्त), आराजी (खेत खलिहान), आर्नर्तक (देश का निवासी), अवतंश (कान की बाली), आलय (भवन), आलिंद (थक), आलजाल (उलजलूल), इकसर (अकेला), खुलगिल (गडमड), कुअंक (बदकिस्मत), इकसर (एकाकी), कैसर (सम्राट), अहलकार (कर्मचारी और नौकरचाकर), अहमक (पागल), कुदलाता (उछलना- कूदना), अहिनक (नित्य-दैनिक), अहरोत्र (दिन रात), कूंजगली (बेलकी गलियां), असंग (असह्य), अवना (अस्तित्व वाला), अहोरात्र (दिन-रात), आपचारी (मनमानी करने वाला), आराजी (खलिहान), अवली (झुण्ड) ।